कवि – अंकित मिश्रा

जब सोता है जहान ये सारातब कही कोई जगता है
होता है कुछ कहने को आतुरपर लब गुमसुम सा रहता है
शब्द उमड़ते हैं मन मेंसार नहीं कोई बनता है
सुनते हैं बस सादे पन्नेकोई नहीं जब सुनता है
दर्द उतरने लगता है इनपरएक कारवां चल पड़ता है
भरने लगता है गलामोती सा बह चलता हैद
ेता है फिर वो एक नाम इन्हेंजिसे हर कोई कविता कहता है।

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